होली… तुम बदल गई या हम ? | बदलते समाज पर एक भावुक हिंदी कविता । holi-tum-badal-gayi-ya-hum-hindi-kavita


                       होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह रिश्तों की मिठास, गांव की एकजुटता और अपनापन का प्रतीक है। लेकिन क्या आज की होली पहले जैसी रही है? क्या सच में त्योहार बदल गया है या हम और हमारा आधुनिक समाज बदल गया है? 
                       
                          प्रस्तुत है बदलती होली और फीके पड़ते रिश्तों पर आधारित एक भावुक हिंदी कविता।





        होली… तुम बदल गई या हम ? 
  
                               ✍️ किशोर 


तुम बदली हो या मैं बदल गया,
कुछ समझ नहीं आता है।
दोष किसे दूँ बताओ —
समय को, समाज को
या बदलती हुई मानसिकताओं को?

कभी पूरा गाँव मेरा अपना था,
हर आँगन में मेरा रंग उतरता था।
बड़े हों या छोटे, सबको
अबीर लगा गले मिलता था।
बड़ों से आशीष पाता,
छोटों को दुलार देता था।





पर अब तस्वीर बदल गई है…
गाँव तो दूर,
अपने ही मुहल्ले के लोग
नज़रों से बचने लगे हैं।
मैं रंग लिए खड़ा रहता हूँ,
और वे दूर से ही
चेहरे छुपाने लगे हैं।

पहले दो-तीन ड्रम रंग भी
कम पड़ जाते थे,
हँसी इतनी घुलती थी हवाओं में
कि दिन छोटा लग जाता था।
अब तो एक पिचकारी रंग भी
मुझसे खत्म नहीं होती —
जैसे उत्सव से पहले ही
मन खाली हो जाता है।

ठंडई और भांग का वो हल्का नशा,
चाचा, दादा, संग भतीजा…
न कोई बड़ा, न कोई छोटा,
बस रंगों में डूबे
हमउम्र से दीवाने।

पर अब न वो रिश्ते रहे,
न रिश्तों की वही मिठास।
किससे कहूँ, क्या कहूँ —
अब फीकी लगती है होली,
और उमस भरी लगती हैं गलियाँ।

आजकल मैं बंद कमरे में बैठा,
बीते कल के रंगीन दृश्य
याद करता रहता हूँ।
हर हँसी, हर शरारत,
हर भीगा हुआ चेहरा…
तुझे याद कर-कर के,
बहुत याद करता हूँ।

डियर होली…
अब तो बता दो —
तुम बदली हो या मैं?
या फिर
मेरा आधुनिक समाज?

पर सच कहूँ,
आई मिस यू…
हमेशा।



        🎨 कविता का भावार्थ

               यह कविता पुरानी गांव वाली होली की यादों और आज की आधुनिक, सीमित और औपचारिक होली के बीच का अंतर दिखाती है।
कवि सवाल करता है कि क्या समय ने त्योहार को बदला है या इंसानों की सोच और जीवनशैली ने रंगों की गर्माहट छीन ली है।

यह रचना केवल होली की बात नहीं करती, बल्कि बदलते सामाजिक रिश्तों पर भी गहरा प्रहार करती है।



  🌈 बदलती होली: एक सामाजिक दृष्टिकोण


पहले :

होली सामूहिक उत्सव था
रिश्तों में दूरी नहीं थी
रंगों में भेदभाव नहीं था
गांव की गलियाँ हंसी से भर जाती थीं ।

आज:

लोग सीमित दायरे में सिमट गए हैं
डिजिटल शुभकामनाएँ असली मुलाकातों की जगह ले चुकी हैं
त्योहार औपचारिकता बनते जा रहे हैं।




क्या सच में होली बदल गई है?

शायद होली नहीं बदली…
बल्कि हमारे रिश्तों की प्राथमिकताएँ बदल गई हैं।
यह कविता उसी आत्ममंथन की आवाज़ है।





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