हाले-दिल तुमसे क्या कहूँ | दर्द भरी हिंदी ग़ज़ल | hale - dil -tumse - kya - kahoon
“हाले-दिल तुमसे क्या कहूँ” एक ऐसी ही दर्द भरी हिंदी ग़ज़ल है, जिसमें तन्हाई, अधूरी मोहब्बत और दिल की अनकही भावनाओं को व्यक्त करने की कोशिश की गई है। यह ग़ज़ल उन लोगों के जज़्बात को आवाज़ देती है जो किसी को चाहकर भी पा नहीं सके और उसकी यादों के साथ जीना सीख गए।
हाले दिल तुमसे क्या कहूं
✍️ किशोर
गुमसुम-सा उदास रहता हूँ मैं,
हाले-दिल तुमसे क्या कहूँ।
ज़िंदगी से जैसे थक गया हूँ मैं,
आख़िर और कितना ग़म सहूँ।
दिल में उसकी यादों का मेला है,
उन्हें भुलाकर भी कैसे रहूँ।
जी चाहता है मिट जाऊँ दुनिया से,
पर मौत को भी गले कैसे लगाऊँ।
दिल में उसकी तस्वीर बसी है अब तक,
शायद अगले जनम में उसे पा सकूँ।
भूलना भी चाहूँ तो भूल न पाऊँ,
और बिन उसके चैन से जी भी न सकूँ।
ये “किशोर” कैसा मुकद्दर पाया है,
हाले-दिल तुमसे क्या कहूँ।
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Wah
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
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