अंजान शहर का अकेला मुसाफिर | दर्द भरी हिंदी ग़ज़ल । anjan-shahar-ka-akela-musafir-ghazal
कुछ शहर यादों से बनते हैं, कुछ मुलाक़ातों से, और कुछ बिछड़नों से।
कभी-कभी हम भीड़ के बीच खड़े होते हैं, फिर भी भीतर से बिल्कुल अकेले।
एक अंजान शहर में कदम रखते ही हम सिर्फ रास्तों से नहीं, अपने ही अस्तित्व से भी रूबरू होते हैं।
“अंजान शहर का अकेला मुसाफ़िर” सिर्फ एक प्रेम कथा नहीं, बल्कि उस एहसास की कहानी है जहाँ उम्मीदें जन्म लेती हैं, आँखें ख्वाब देखती हैं, और फिर नसीब अपनी अलग ही दास्तान लिख देता है।
यह ग़ज़ल उस मुसाफ़िर की आवाज़ है — जो भीड़ में भी तन्हा है, और तन्हाई में भी उम्मीद का दीप जलाए रखता है।
अंजान शहर का अकेला मुसाफ़िर
✍️ किशोर
अंजान शहर की गलियों में भटकता एक मुसाफ़िर था मैं,
हर मोड़ पर अपनी ही परछाइयों से मुख़ातिब था मैं।
न मंज़िल का पता, न रास्तों का कोई यक़ीं,
भीड़ के समंदर में डूबता हुआ साहिल था मैं।
फिर यूँ हुआ कि एक नज़र ने दस्तक दी दिल पर,
सूनी सी दुनिया में जैसे उतर आया काफ़िल था मैं।
आँखों की ख़ामोशी ने जो दास्ताँ लिखी उस पल,
लब ख़ामोश रहे मगर भीतर से क़ाबिल था मैं।
ख़्वाबों ने रंग भरे थे आने वाली सुबहों में,
सोचा था अब मुकम्मल अपनी हर महफ़िल था मैं।
पर नसीब की तहों में कुछ और ही लिखा था,
उसकी राहों से जुदा होकर फिर मायूस दिल था मैं।
वो चली गई तो शहर फिर अजनबी सा लगने लगा,
कल भी तन्हा था, आज भी वही साहिल था मैं।
ज़िंदगी के सफ़र में हर मुसाफ़िर को कोई न कोई शहर मिलता है —
कुछ लोग ठहर जाते हैं, कुछ याद बन जाते हैं, और कुछ सिर्फ एक अधूरी कहानी।
कभी-कभी मिलना ही मुकम्मल होना नहीं होता,
और बिछड़ना ही अंत नहीं होता।
कुछ रिश्ते बस एहसास बनकर रह जाते हैं —
जो हमें और गहरा, और संवेदनशील बना देते हैं।
यह ग़ज़ल उसी एहसास को समर्पित है —
उस तन्हाई को, जो हमें तोड़ती भी है और हमें खुद से मिलाती भी है।
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