रंगों में लौटी मुस्कान – दिल छू लेने वाली होली कहानी । rangon-me-lauti-muskan


            रंगों में लौटी मुस्कान

                                            ✍️ किशोर 



          गांव में होली का मौसम था। चारों तरफ ढोलक की थाप, बच्चों की हंसी और हवा में उड़ते गुलाल से पूरा माहौल रंगीन हो चुका था। मगर उसी गांव के एक छोटे से कच्चे घर में बैठे रामू काका के जीवन में कई सालों से कोई रंग नहीं था।

          रामू काका की पत्नी के गुजर जाने के बाद उनका इकलौता बेटा राजेश शहर कमाने चला गया था। शुरू में वह हर होली पर घर आता था, मगर नौकरी और जिम्मेदारियों में उलझकर पिछले चार साल से गांव नहीं आया था।






       हर साल होली के दिन रामू काका दरवाजे पर बैठकर सड़क की तरफ देखते रहते।
उन्हें लगता शायद इस बार बेटा अचानक आ जाए…
मगर हर बार शाम ढल जाती और उनकी उम्मीद भी।

इस बार भी वही हुआ।

होली की सुबह गांव में शोर था —
“होली है… होली है…”

बच्चे रंग लेकर दौड़ रहे थे।

         मगर रामू काका चुपचाप आंगन में बैठे पुराने फोटो को देख रहे थे जिसमें राजेश छोटा था और दोनों ने एक-दूसरे को रंग लगाया था।

उनकी आंखों से आंसू टपक पड़े।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

रामू काका ने सोचा कोई पड़ोसी होगा।
धीरे से दरवाजा खोला…

सामने राजेश खड़ा था — हाथ में गुलाल, आंखों में शर्म और चेहरे पर मुस्कान।

“बाबा… होली मुबारक…”

        रामू काका कुछ पल तक उसे देखते ही रह गए।

फिर कांपते हाथों से उसके चेहरे को छुआ — जैसे यकीन कर रहे हों कि सपना नहीं है।

राजेश झुककर उनके पैर छूता है और गुलाल लगाता है।
रामू काका की आंखों से आंसू बहने लगते हैं।

“माफ कर दो बाबा…
शहर की भागदौड़ में समझ ही नहीं पाया कि असली खुशी तो यहां है…”

रामू काका ने उसे गले लगा लिया।

उस दिन उनके घर में सिर्फ गुलाल नहीं उड़ा —
सालों से बुझी मुस्कान भी लौट आई।

राजेश ने उसी शाम फैसला किया कि वह हर साल होली गांव में ही मनाएगा।

गांव वालों ने देखा —
उस छोटे से घर से सबसे ज्यादा हंसी की आवाज आ रही थी।

क्योंकि इस बार होली सिर्फ रंगों की नहीं,
रिश्तों की भी थी।



   कहानी का संदेश

         कभी-कभी जिंदगी के सबसे खूबसूरत रंग
पैसे से नहीं, अपनों के साथ से आते हैं।






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