बूढ़ा बाप और सरकारी नौकरी – एक भावुक हिंदी कहानी | boodha-baap-aur-sarkari-naukri-hindi-kahani
बूढ़ा बाप और सरकारी नौकरी
✍️ किशोर
गाँव के किनारे एक कच्चा सा घर था। दीवारों पर मिट्टी की परत चढ़ी हुई, छत पर पुरानी खपरैल, और आँगन में एक नीम का पेड़। उसी घर में रहता था रामकिशन — दुबला-पतला, झुकी कमर, चेहरे पर झुर्रियाँ, मगर आँखों में एक सपना।
उसका सपना था —
“मेरा बेटा बाबू बनेगा… सरकारी नौकरी करेगा।”
रामकिशन खुद ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था। दिन भर खेतों में मजदूरी करता, कभी ईंट-भट्टे पर काम कर लेता, कभी किसी के घर की मरम्मत। जो भी मिलता, कर लेता। उसकी पत्नी सरस्वती अक्सर कहती—
“इतना मत थको जी, शरीर है, पत्थर नहीं।”
रामकिशन मुस्कुरा देता—
“हमारा शरीर भले टूट जाए, पर संदीप की पढ़ाई नहीं टूटनी चाहिए।”
संदीप उनका इकलौता बेटा था। पढ़ने में तेज, समझदार और बड़े सपनों वाला। गाँव का मास्टर भी कहता था—
“रामकिशन, अगर इसे शहर भेज दो तो बड़ा अफसर बन सकता है।”
बस वही दिन था जब रामकिशन ने तय कर लिया— चाहे जो हो, बेटा पढ़ेगा।
संघर्ष की शुरुआत
संदीप को शहर के कॉलेज में दाखिला मिल गया। फीस सुनकर रामकिशन के पैरों तले जमीन खिसक गई। घर में इतने पैसे कहाँ थे?
उसने अपना छोटा सा खेत गिरवी रख दिया। सरस्वती ने अपने शादी के समय के गहने निकाल दिए।
“ये रख लो… बेटे के काम आएंगे,” उसने धीमे से कहा।
रामकिशन की आँखें भर आईं—
“तुम्हारे गहने हैं ये…”
“मेरा गहना मेरा बेटा है,” सरस्वती मुस्कुरा दी।
संदीप शहर चला गया। शुरू-शुरू में हर हफ्ते फोन करता। माँ से हाल पूछता, बाप से पढ़ाई के खर्च की चिंता करता। मगर धीरे-धीरे पढ़ाई बढ़ी, दोस्त बढ़े, शहर की चमक बढ़ी… और फोन कम होते गए।
सफलता का दिन
कई सालों की मेहनत के बाद वह दिन भी आया, जब संदीप की सरकारी नौकरी लग गई। पूरे गाँव में मिठाई बंटी। रामकिशन का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।
“मेरा बेटा बाबू बन गया!”
वह हर मिलने वाले से यही कहता।
सरस्वती उस दिन बहुत खुश थी, मगर उसकी तबीयत कई महीनों से ठीक नहीं चल रही थी। खुशी के कुछ ही महीनों बाद वह दुनिया छोड़ गई।
घर में अब सिर्फ रामकिशन रह गया।
बदलती दुनिया
संदीप की पोस्टिंग शहर में थी। शुरू में वह हर महीने गाँव आता। लेकिन फिर काम का बहाना, मीटिंग का बहाना, जिम्मेदारियों का बहाना…
फोन भी अब औपचारिक हो गया था।
“हाँ बाबूजी, सब ठीक है ना?”
“हाँ बेटा, सब ठीक है।”
“ठीक है, अभी मीटिंग है, बाद में बात करता हूँ।”
गाँव वाले ताना मारते—
“रामकिशन, बाबू बनते ही बेटा बदल गया लगता है।”
रामकिशन हँस देता—
“नौकरी बड़ी है, जिम्मेदारी बड़ी है। हमारा बेटा हमें क्यों भूलेगा?”
मगर रात को जब वह नीम के पेड़ के नीचे अकेला बैठता, तो आँखें भीग जातीं।
छुपा हुआ सच
एक दिन शहर में ऑफिस के किसी पुराने कर्मचारी ने संदीप से कहा—
“तुम्हारी फाइल तो बड़ी तेजी से पास हुई थी। लगता है ऊपर तक पहुँच थी तुम्हारे घर की।”
संदीप चौंका। उसने कभी किसी सिफारिश की बात नहीं सुनी थी।
छानबीन करने पर उसे पता चला — उसके पिता ने उसकी नौकरी के लिए किसी नेता को पैसे दिए थे। पैसे कहाँ से आए?
उसने गाँव के एक परिचित से पूछा। जवाब सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई—
“तुम्हारे बाबूजी ने खेत बेच दिया… और साहूकार से कर्ज भी लिया। बोले — ‘बस मेरा बेटा बाबू बन जाए।’”
संदीप की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
गाँव की सच्चाई
उसी शाम वह बिना बताए गाँव के लिए निकल पड़ा।
जब वह घर पहुँचा तो देखा —
नीम का पेड़ अब भी था, मगर घर की दीवारों में दरारें बढ़ गई थीं। आँगन सूना था। दरवाजा आधा टूटा हुआ।
अंदर चारपाई पर रामकिशन लेटा था। चेहरा और झुक गया था, साँस धीमी-धीमी चल रही थी।
“बाबूजी…” संदीप की आवाज काँप गई।
रामकिशन ने आँखें खोलीं। बेटे को सामने देखकर चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
“आ गया बेटा? बहुत काम रहता होगा… परेशान मत हुआ कर।”
संदीप घुटनों के बल बैठ गया।
“बाबूजी… आपने खेत क्यों बेच दिया? कर्ज क्यों लिया? मुझे क्यों नहीं बताया?”
रामकिशन ने धीमे से कहा—
“तू खुश है ना बेटा? तेरी कुर्सी पक्की है ना? बस वही काफी है। जमीन फिर आ जाएगी… लेकिन मौका चला जाता तो?”
संदीप फूट-फूट कर रो पड़ा।
उसे याद आने लगा —
वह दिन जब बाप फटे कपड़ों में स्कूल की फीस भरने आया था।
वह रात जब बाप ने खुद भूखा रहकर उसे दूध दिया था।
वह वक्त जब बाप ने गाँव वालों के ताने सहकर भी उसका साथ नहीं छोड़ा।
और उसने…?
वह तो बस शहर की जिंदगी में उलझ गया था।
कर्ज का बोझ
अगले दिन साहूकार घर आ गया।
“रामकिशन, ब्याज बढ़ता जा रहा है। अब पैसे दो, नहीं तो घर भी चला जाएगा।”
संदीप बाहर आया।
“कितना कर्ज है?”
राशि सुनकर वह चुप रह गया। रकम बड़ी थी, लेकिन अब वह कमाने वाला था।
उसने उसी दिन शहर लौटकर अपनी बचत निकाली, कुछ उधार लिया, और पूरा कर्ज चुका दिया।
नया फैसला
संदीप ने अपने ऑफिस में ट्रांसफर के लिए आवेदन दिया। कोशिश की कि पोस्टिंग नजदीक के जिले में हो जाए। कुछ महीनों बाद उसकी पोस्टिंग पास के शहर में हो गई।
अब वह हर शाम गाँव आता। पिता को डॉक्टर दिखाता। घर की मरम्मत करवाई। नीम के पेड़ के नीचे एक नई चारपाई डलवाई।
एक दिन उसने पिता से कहा—
“बाबूजी, मैं आपको अपने साथ शहर ले चलता हूँ।”
रामकिशन मुस्कुराया—
“हमारा मन तो इसी मिट्टी में है बेटा… लेकिन तू रोज आ जाता है, अब अकेलापन नहीं लगता।”
संदीप ने गाँव में एक छोटा सा पुस्तकालय बनवाया। नाम रखा—
“रामकिशन अध्ययन केंद्र”
उद्घाटन के दिन पूरा गाँव जमा था।
संदीप ने सबके सामने कहा—
“जिस बाप ने मुझे बाबू बनाया, आज मैं उसी के नाम से ये जगह बना रहा हूँ। अगर वो न होते, तो मैं कुछ भी नहीं होता।”
रामकिशन की आँखों से आँसू बह रहे थे, मगर इस बार वो अकेलेपन के नहीं, गर्व के आँसू थे।
अंतिम दृश्य
शाम को नीम के पेड़ के नीचे दोनों बैठे थे।
रामकिशन ने आसमान की ओर देखा और धीमे से कहा—
“सरस्वती, देख… हमारा बेटा सच में बड़ा आदमी बन गया।”
संदीप ने पिता का हाथ पकड़ लिया।
उसे समझ आ चुका था —
सरकारी नौकरी बड़ी हो सकती है, कुर्सी ऊँची हो सकती है, लेकिन बाप के त्याग से बड़ी कोई पदवी नहीं होती।
नीम के पत्ते हवा में हिल रहे थे, जैसे आशीर्वाद दे रहे हों।
अंतिम पंक्ति:
जिस बाप ने बेटे को बाबू बनाया, बेटे ने उस बाप को अपना भगवान बना लिया।
👉 ऐसी ही प्रेरणादायक एवं मजेदार कहानियाँ पढ़ने के लिए किशोरवाणी ब्लॉग फॉलो करें।
👉 पोस्ट पसंद आए तो कमेंट भी जरूर लिखें ।
👉 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। आपका कॉमेंट हमें बेहतर लिखने की प्रेरणा देता है।